Farmers Story Babuji
लगभग 180 साल पहले, जर्मनी के जस्टिस वॉन लीबिग ने कृषि में रसायनों, विशेष रूप से नाइट्रोजन के साथ प्रयोग किया था। आगे जाकर कुछ अन्य रसायनों की भी खोज की गई। पहले कुछ सालों तक उत्पादन अच्छा रहता है। इसे देखकर किसानों ने रासायनिक खाद और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। इस जरूरत को पूरा करने के लिए प्रथम विश्व युद्ध के बाद काम न करने वाले युद्ध सामग्री के कारखानों ने भी रासायनिक-उर्वरक बनाने शुरू कर दिए और कृषि में रासायनिक उत्पादों का प्रयोग जोर-शोर से होने लगा। इस प्रकार समय बीतने के साथ-साथ रसायनों और उर्वरकों के कारण सजीव मिट्टी को बेजान बनाने लगी। इस बात का पता चलते ही राजस्थान राज्य के बाड़मेर जिले के हाथमा गांव के किसान बाबूरामजी समझ गए कि मैं इस खाद का प्रयोग कर रहा हूं, इससे मेरी जमीन और मेरे परिवार को कितना नुकसान हो रहा है। इस बात को समझकर जीव कृषि को रोचक तरीके से समझने और उसे इस दिशा में मोड़ने की भरसक कोशिश करता है।
परिचय:-
खेती करने से पहले मैं चंडीगढ़ में एक निजी कंपनी में कार्यरत था। मैंने वह नौकरी छोड़ दी और कृषि में लग गया। जब मैं कृषि में आया तो वर्षा ऋतु में मैं बाजरा, मूंग और मठ्ठा लगाता था। उसके बाद 2012 में 200 बेर लगाए और ये सभी बेर ग्राफ्ट करके खुद तैयार किए। तब मुझे पानी की बड़ी समस्या थी। तब मैं बोर में लिए पानी देने के लिए गांव से पानी के टैंकर मंगवाता था। बोर में पानी डालने के लिए टपक सिंचाई विधि का प्रयोग किया जाता है। इस तरह 3 साल तक पानी के टैंकर बाहर से मंगवाए गए। 2015 में मेरे खेत में पानी की समस्या दूर करने के लिए 315 फीट गहरा बोरवेल कराया गया। बाद में बोर के बीच 2019 में अनार लगाया। जिसमें 1000 अनार रोपे गए।
तब गर्मियों में मेरे बोरवेल में पानी कम हो जाता था। इसे ठीक करने के लिए मेरे खेत में एक और बोरवेल किया गया। इसकी गहराई 215 फीट है। पहले बोरवेल के बाद से ही मैं वर्षा ऋतु की फसल खत्म होने के बाद सर्दियों में जीरा लगा रहा हूं। पानी की जरूरत पूरी होने के बाद मैंने रासायनिक खाद का प्रयोग शुरू किया है। वर्तमान में मैं जीरे के पौधे की लंबाई बढ़ाने के लिए एक बार यूरिया खाद डालता हूं। अभी मेरे खेत में दीमग की समस्या है जो फसलों की जड़ों को मिट्टी में खा जाते हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए मैं बाजार से रासायनिक कीटनाशक खरीदकर उसका छिड़काव करता हूं। मैं पहले वर्षा आधारित खेती करता था इसलिए मैं जैविक खेती करता था लेकिन अब मेरे पास पर्याप्त पानी है इसलिए मैंने रासायनिक खेती की शुरुवात की थी। अब जब मैं समझ गया हूं कि रसायन मिट्टीको और मुझे कितना नुकसान पहुंचाते हैं, तो मैं जैविक खेती पर वापस जाना चाहता हूं और मैं बेर में खाद के अलावा किसी और चीज का उपयोग नहीं करता हूं। यह कम्पोस्ट खाद अपने खेत पे ही बनता हूं। मैं खेती के साथ-साथ पानी के टैंकरों से गावमे पानी की आपूर्ति करता हूं।
खाद:-
मेरे पास 2 गाय और 1 बकरी है। कंपोस्टिंग के लिए मैं गाय के गोबर और बकरी के गोबर से कम्पोस्ट तैयार करता हूं।
कम्पोस्ट:-
कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए मेने दो केलिया बनाए है। जिसकी लंबाई 8x3x3 की है। इस खेली में गोबर और मिग्णी डालकर पूरा भर जाए तब इस पर डी-कंपोजर छिड़क कर कम्पोस्ट खाद बनाता हूं। साथ-साथ में जीवामृत और घन जीवामृत बनाना सीखा हूं।
उत्पादन:-
मेरे खेत की बागवानी में बेर और अनार हैं। जिसमें एक बेर से मुझे 70-80 किलो उत्पादन मिलता है और अनार की अभी फसल नहीं हुई है। साथ ही खेत में जीरे की खेती की थी, जिसमें मुझे 400 किलो उत्पादन मिलता है और बारिश के मौसम में मैं बाजरा, मूंग और मठ्ठा लगाता हूं। जिसे मैं अपने घर में खाने के लिए और अगले साल बोने के लिए रखता हूँ। मैं सारी फसल मंडी प्रांगण में बेचता हूं।
अभी मैं अपने खेत को पूरी तरह प्राकृतिक बनाना चाहता हूं और उस पर काम कर रहा हूं। साथ ही कृषि में नई-नई चीजें सीख रहा हूं और सीखता रहूंगा।